रीवा जिले के कृषि उत्पादन में वित्तीय संस्थानों का योगदान
(रीवा जिले विशेष संदर्भ में)
कंचन सोंधिया
शोधार्थी (वाणिज्य), शासकीय ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय, रीवा (म0प्र0)
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
प्राचीन काल से ही भारत कृषि प्रधान देश रहा है। उस समय देश में विस्तृत कृषि पद्धति प्रचलित थी। ग्रामवासी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में स्वावलम्बी थे। जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि होने के कारण स्वतंत्रता के समय से ही खाद्यान्नों की कमी प्रतीत होना शुरू हुई। खाद्यान्नों का भारी मात्र में प्रतिवर्ष आयात किया गया। इसलिए देश में खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि विकास को प्राथमिकता दी गई। कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने में विभिन्न वित्तीय संस्थानों का महत्वपूर्ण स्थान है। यह संस्थान किसानों को ऋण बीमा और अन्य वित्तीय सहायता प्रदान करके कृषि क्षेत्र को मजबूत करते है। हमारे देश में लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या कृषि कार्य पर निर्भर है।1 लेकिन कृषकों को वर्ष पर्यन्त कार्य नहीं मिल पाता अतः इस दृष्टि से रीवा जिले में ही नहीं वरन् भारत में कृषि उत्पादन में वित्तीय संस्थानों का योगदान है।
KEYWORDS: शाख, बैंक, आर्थिक वृद्धि, सहकारी संख्या विकास
प्रस्तावना:-
कृषि विकास के लिए देश में सामुदायिक विकास कार्यक्रम, सघन कृषि योजना उन्नत बीजों का अविष्कार एवं उपयोग, उर्वरकों व कीटनाशी दवाईयों का अधिक उत्पादन एवं उनका उपयोग कृषि की उन्नत विधियों का अविष्कार लघु एवं सीमान्त हेतु बैंकों का राष्ट्रीयकरण, कृषि बीमा आदि कार्यक्रम शुरू किये गये। कृषि विकास के इन कार्यक्रमों के फलस्वरूप देश से खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि हुई लेकिन देश अनेक कृषि उत्पादों के उत्पादन में आत्म-निर्भर नहीं हो सका।2 भारत कृषि प्रधान देश होते हुए भी कृषि क्षेत्र में अन्य विकसित देशों के समान प्रगति नहीं कर सका। इसका प्रमुख कारण भारतीय कृषि की अपनी कुछ विशेषताएं है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला है जो देश की लगभग आधी आबादी को आजीविका प्रदान करती है और रोजगार के महत्वपूर्ण स्त्रोत के रूप में कार्य करती है। यह सकल घरेलू उत्पाद में महत्वपूर्ण योगदान देती है। ग्रामीण विकास का समर्थन करती है और राष्ट्र के मुख्य उद्देश्य देश के सदस्यों के लिए भोजन का उत्पादन करना है। सरकार किसानों को कृषि के विकास में कई प्रकार से सहायता करती है। सरकार ने यह व्यवस्था की है कि कृषक चाहें तो सरकारी कृषि अधिकारियों से सलाह कर सकते है। सरकार कृषकों को रियायती दरों पर उन्नत बीज, खाद, मशीनें आदि उपलब्ध करवाती है।3
कृषि साख का अर्थ:-
कृषि साख का अर्थ उस साख से है जिसकी आवश्यकता कृषि कार्य करने में होती है। इस साख की आवश्यकता बीज, खाद व यंत्र क्रय करने या मालगुजारी देने या कृषि सम्बंधी अन्य कार्य के लिए हो सकती है। इस कृषि साख संस्थाएं भूमि विकास बैंक भूमि बन्धक बैंक सरकार व वित्तीय निगमों के द्वारा की जाती है।
भारत साख का अर्थ:- भारत में कृषि साख की आवश्यकताओं को निम्न तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
1. अल्पकालीन साख:- भारत में कृषक को बीज, उर्वरक, चारा, श्रमिकों को मजदूरी तथा अन्य तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए अल्पकालीन साख या ऋण की आवश्यकता होती है। एक साल या ऋण की अवधि 15 माह तक होती है। जब फसल काट ली जाती है तो ऋण को चुका दिया जाता है।
2. मध्यकालीन साख:- कृषक को अपनी भूमि में सुधार के लिए भी कुछ साख या ऋण की आवश्यकता होती है। पशु क्रय करने के लिए ऋण की अवधि 15 माह से लेकर 5 वर्ष तक की होती है।
3. दीर्घकालीन साख:- इस साख की आवश्यकता उस समय होती है जबकि नयी भूमि क्रय करके अपने भू-खण्ड की मात्रा बढ़ाना, पुराने ऋण को चुकाना, भूमि में कोई स्थायी सुधार करना या कृषि के लिए मूल्यांकन मशीनरी आदि खरीदना चाहता है। इस प्रकार साख या ऋण की अवधि 5 वर्ष से अधिक 10 या 20 वर्ष तक हो सकती है।
पूर्व में किये गये शोध कार्यो की संक्षिप्त समीक्षा:-
1. केवल कुमार (1988) ने अपने अध्ययन में पाया कि वाणिज्यिक बैंकों द्वारा उच्च उपज कृषि तकनीक में सुधार आदि के लिये जो ऋण दिया जाता है। वह पर्याप्त नहीं है। इनका निष्कर्ष यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी संस्थाओं तथा कृषकों के मध्य इस प्रकार का समन्वय होना चाहिए कि निरंतर ऋण प्रवाहित होता है जिससे कृषि उत्पादन पर सरकारी संस्थाओं का प्रभाव बना रहें।
2. चौधरी तथा शर्मा (1989) ने आंध्रप्रदेश राज्य का अध्ययन कर यह सुझाव दिया कि पंजाब राज्य की तरह अगर कृषि की उत्पादकता तथा उच्च उपज किस्म को तैयार करना है तो राज्य बैंकों का जाल (कृषक आवश्यकतानुसार) बिछाना होगा।
प्रस्तुत शोध का उद्देश्य:-
रीवा जिले के कृषि विकास संस्थागत वित्त व्यवस्था के संदर्भ में अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है।
1. रीवा जिले के कृषि के विकास में व्यापारिक बैंकों की भूमिका का मूल्यांकन करना।
2. रीवा जिले के कृषि विकास में क्षेत्रीय तथा सहकारी संस्थाओं के योगदान का मूल्यांकन करना।
3. जिले में बैंकिग की कार्यप्रणाली का अध्ययन करना तथा उनकी कमियों के प्रति संकेत करना।
4. ऋण किसानों को फसल उत्पादन सिंचाई और कृषि उपकरण खरीदने के लिए ऋण प्रदान करना।
5. बीमा किसानों को फसल बीमा प्रदान करना ताकि वे प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान से बच सके।
6. विपणन सहायता किसानों को उपज को बेहतर कीमतों पर बेचने में मदद करने के लिए विपणन सहायता प्रदान करना।
परिकल्पना:-
प्रस्तुत शोध की परिकल्पनाएं निम्न हैं।
1. कृषि से संबंधित सभी क्षेत्रों में संस्थागत संस्थाओं के माध्यम से दी।
2. लाभार्थियों के द्वारा ऋण के सम्पूर्ण भाग का उचित उपयोग न कर पाना।
3. बैंकों के माध्यम से ऋण प्राप्त करने में अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। अनेक औपचारिताओं को पूरा करना पड़ता है।
शोध प्रविधि:- प्रस्तुत अध्ययन रीवा जिले के कृषि के विकास में संस्थागत वित्त की व्यवस्था के संदर्भ में मुख्य रूप से प्रकाशित विवरणों से प्राप्त संमकों अर्थात् द्वितीय संमकों पर आधारित है। इसके अतिरिक्त प्राप्त विवरणों की सत्यता की जाँच के लिए भी प्रयास किया गया है।4
रीवा जिले में राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक द्वारा कृषि ऋण:-
रीवा जिले की ग्रामीण विकास का सीधा संबंध कृषि विकास से है जब तक कृषि का उचित रूप से प्रावर्तन नहीं होता तब तक विकास की संभावना न के बराबर होगी इसी उद्देश्य को साकार करने के लिए सरकार ने नाबार्ड की स्थापना की थी जो ग्रामीण क्षेत्रों को ऋण उपलब्ध कराता है। नाबार्ड स्वयं ऋण नहीं उपलब्ध कराता बल्कि अन्य एजेंसियों बैंकों संस्थाओं के माध्यम से ऋण प्रदान कराता है। रीवा जिले में कृषि ऋण देने वाली प्रमुख एजेंसियों का ब्यौरा इस प्रकार संकलित हो पाया है।5
तालिका क्रमांक 3.1: बैंकिग की रूपरेखा
|
एजेंसी |
बैंकों में समितियों की संख्या |
शाखाओं की संख्या |
सहकर्मी अनौपचारिक एजेंसियों की संख्या |
प्रतिशत शाखा प्रसार |
||||||
|
योग |
ग्रामीण |
अर्द्ध शहरी |
शहरी |
सूक्ष्म वित्त संस्थायें संगठन |
स्व-सहायता समूह/कैसिलिटेर |
व्यावसाय संवादाता कैसिलिटे |
गाँव |
परिवार |
||
|
वाणिज्यिक बैंक |
12 |
56 |
47 |
- |
9 |
- |
- |
- |
- |
- |
|
क्षेत्रीय ग्रामीणों बैंक |
1 |
54 |
46 |
- |
9 |
- |
- |
- |
- |
- |
|
जिला सहकारी बैंक |
1 |
17 |
14 |
- |
3 |
- |
- |
- |
- |
- |
|
सहकारी कृषि व ग्रामीण विकास बैंक |
1 |
6 |
5 |
- |
1 |
- |
- |
- |
- |
- |
|
प्राथमिक कृषि सहकारी समिति |
146 |
148 |
148 |
- |
- |
- |
- |
- |
- |
- |
|
अन्य |
- |
- |
- |
- |
- |
- |
- |
- |
- |
- |
|
सभी एजेसियां |
- |
- |
- |
- |
- |
- |
4829 |
उ. न. |
18 |
35 44 |
रीवा जिले में ग्रामीण विकास के लिए ऋण देने वाली संस्थान की स्थिति:-
जिले में कुल वाणिज्यिक बैंकों की संख्या लगभग 12 की है। जिसका कुल योग 56 का है इसमें से 47 संस्थाये ग्रामीण आंचलों में खोली गयी है, तथा 9 संस्था शहरी इलाके में स्थापित किये गये है। जिल में एक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की स्थापना की गई है। जिसकी कुल 54 शाखायें हैं जिनमें से 48 ग्राम क्षेत्रों में स्थापित है तथा 6 शहरी इलाकों में स्थापित की गयी है। जिले में एक जिला सहकारी बैंक भी जिसकी कुल 6 शाखाऐं है। 5 ग्राम क्षेत्रों में एक शहरी क्षेत्र में स्थापित की गयी है। जिले में एक जिला सहकारी बैंक भी है जिसकी कुल 6 शाखायें है 5 ग्राम क्षेत्रों में एक शहरी क्षेत्र में स्थापित की गयी है। ग्रामीण ऋण में प्राथमिक कृषि समितियों का काफी योगदान रहा है जिले में इसकी संख्या 148 की है जो ग्रामीण आँचलों तक ही व्याप्त है। देखा जाय तो कुल 161 एजेंसियों जिले में ऋणदायी संस्थाओं के एक रूप विद्यमान है जिनकी कुल शाखायें 179 है इनमें से 260 ग्रामीण आँचलों में तथा 19 शाखायें शहरी इलाके में स्थापित है। इन एजेंसियों के साथ ही 7829 अनौपचारित संस्थाओं के ऋण उपलब्ध कराने के कार्य में संलग्न है।6
जिले में प्रमुख चार एजेंसियों ऋण नाबार्ड के द्वारा ऋण उपलब्ध कराने में अपना अग्रिम स्थान रखती है जिले में वाणिज्यिक बैंकों द्वारा 2007 में 4598692 लाख रूपये अग्रिम ऋण देयता दर्ज करायी। ऋण 2007 में प्रदान करती है। करायी जो 2000 में वृद्धि की सामाजिक ऋण में भूमिका 14.83 प्रतिशत की रही है। बैंक ऋण ने 2009 में 1263724 लाख का ऋण उपलब्ध करा पाती है। इसके साथ ही अन्य एजेंसियों के द्वारा कुल ग्रामीण ऋण में 3.98 प्रतिशत भागीदारिता स्पष्ट करती है देखा जाये तो सभी एजेंसियों मिलकर 2009 में 85009296 लाख रूपये का ऋण उपलब्ध कराती हैं।7
तथ्य संकलन एवं सारणीयन:-
तालिका क्रमांक 1: नावार्ड द्वारा दिये गये ग्रामीण विकास ऋण और अग्रिम (एजेंसीवार) ऋण और अग्रिम
|
एजेंसी |
ऋण राशि (रूपये में) |
||||
|
|
31 मार्च 07 |
31 मार्च 08 |
31 मार्च 09 |
वृद्धि (%) |
हिस्सा (%) |
|
वाणिज्यिक बैंक |
4598692 |
5344808 |
5709822 |
6.83 |
67.02 |
|
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक |
943113 |
1142331 |
1267753 |
10.98 |
14.88 |
|
सहकारी बैंक |
115761 |
1194423 |
1263721 |
- |
3.26 |
|
अन्य |
- |
2000 |
278000 |
- |
3.26 |
|
सभी एजेंसियों |
6657566 |
7683562 |
85119296 |
- |
100.00 |
तालिका के अवलोकन से उपरोक्त स्पष्ट होता है कि सर्वाधिक ऋण ग्रामीण क्षेत्रों को नावार्ड ने वाणिज्यिक बैंकों के माध्यम से उपलब्ध कराया है तथा दूसरे स्थान पर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक ने अपना स्थान बनाया सहकारी बैंकों की स्थिति ऋण देयता में तीसरे स्थान पर आती है। नावार्ड द्वारा ग्रामीण विकास ऋण में एजेंसीवार क्रमशः 67.2, 14.88, 14.88 तथा 3.36 प्रतिशत कुल ऋण उपलब्धता रही है।8
वार्षिक ऋण योजना के अंतर्गत नावार्ड के द्वारा एजेंसीवार तीन वर्ष के ऋण तालिका का विवरण सारणी द्वारा स्पष्ट हो पाया हैं।
तालिका क्रमांक 2: जिले में वार्षिक ऋण योजना के अंतर्गत एजेंसीवार कार्य निष्पादन
|
एजेंसी |
2006-07 |
2007-08 |
2008-09 |
पिछले तीन वर्षो में औसत उपलब्धि |
||||||
|
|
लक्ष्य (रूपये में) |
उपलब्धि (रूपये में) |
उपलब्धि (%) |
लक्ष्य (रूपये में) |
उपलब्धि (रूपये में) |
उपलब्धि (%) |
लक्ष्य (रूपये में) |
उपलब्धि (रूपये में) |
उपलब्धि (%) |
|
|
वाणिज्यिक बैंक |
100065 |
उ0न0 |
उ0न0 |
1562914 |
1065819 |
66.18 |
144294 |
886478 |
81.46 |
64.82 |
|
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक |
1097172 |
826651 |
75.34 |
441765 |
533410 |
120.74 |
440450 |
316611 |
71.88 |
89.32 |
|
सहकारी बैंक |
614669 |
570403 |
92.79 |
374576 |
162834 |
43.47 |
471956 |
421154 |
82.29 |
75.16 |
|
अन्य |
- |
- |
- |
- |
- |
- |
5000 |
20000 |
400.00 |
- |
|
सभी एजेंसियों |
1811906 |
1397718 |
77.14 |
2379345 |
1762063 |
74.06 |
3259680 |
1644243 |
69.68 |
73.62 |
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने सर्वाधिक कृषि विकास ऋण 2007 में उपलब्ध कटाने का लक्ष्य रखा था जिसमें उसका आंशिक सफलता मिला जो कि अन्य बैंकों से सर्वाधिक रही है 2008 में इस बैंक ने लक्ष्य में ज्यादा उपलब्धि अर्जित की जो कि 120.74 प्रतिशत का औसत रहा। 2008-2009 में इसका संतोषजनक प्रदर्शन 71.88 प्रतिशत का रहां। सहकारी बैंकों की ऋण प्रदान करने में कम महत्वपूर्ण प्रदर्शन 71.88 प्रतिशत का रहा। सहकारी बैंकों की ऋण प्रदान करने में कम महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही है, इस एजेंसी ने 2007 में अपने लक्ष्य का प्राप्त सा ही किया इसने 92.79 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की परंतु वर्ष 2007-08 में इसकी वृद्धि दर घटकर 43.47 प्रतिशत की रही। परंतु 2008-09 में इस संस्था ने सुधार करते हुए 89.29 प्रतिशत की वृद्धि दर अपने खाते में दर्ज करते हुए द्वितीय स्थान प्राप्त किया। यदि एजेंसीवार देखा जाय तो इन तीन सालों में सर्वाधिक लक्ष्य ग्रामीण बैंकों द्वारा 89.3 प्रतिशत ग्रामीण आँचलों में प्रदान किया। यदि सम्पूर्ण एजेंसी की बात करे तो कुल लक्ष्य का मात्र 73.62 प्रतिशत प्राप्ति तीन वर्षो में किया गया जा सका है। जिसका ग्राफ के द्वारा नीचे प्रदर्शित किया गया है। नावार्ड ने ग्रामीण ऋण में सर्वाधिक फसल ऋण को महत्व दिया है। जब तक ग्राम फसल की उपज अच्छी नहीं रहेगी तब तक ग्रामीण आँचलों की उन्नति नहीं हो सकेगी। बिना फसल ऋण के ग्रामीण विकास का प्रश्न ही नहीं उठता है। तीन वर्षो के फसल ऋण में दृष्टिगत करते हुये, जिले में 2006-07 में फसल ऋण 88.18 प्रतिशत उपलब्ध कराया गया जो लक्ष्य से काफी करीब है। 2007-08 में यह थोड़ी सी कमी के साथ 76.89 प्रतिशत तथा 2008-09 में थोड़ी सी कमी के साथ 43.14 प्रतिशत रहा। हालांकि 2008-09 में इसने अपने पूर्व लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर पाया जबकि कृषि मियादी ऋण में 70.54 प्रतिशत का लक्ष्य प्राप्त किया कुल कृषि ऋण का क्रमशः 2007-08, 2008-09 में 62.13 प्रतिशत व 78.56 प्रतिशत रहा कुल कृषि ऋण का अनुपात यदि देखा जाय तो 2007-08 में 99.9 प्रतिशत तथा क्रमशः 2007-08 में 69.4 प्रतिशत का रहा देखा जाय ता कृषि ऋण में कृषि मियादी ऋण के रूप में सर्वाधिक ऋण उपलब्ध कराया गया है।5
देखा जाय तो कृषि ऋण में कृषि मियादी ऋण में रूप में सर्वाधिक ऋण उपलब्ध कराया गया। सारणी द्वारा स्पष्ट है:-
तालिका क्रमांक 3: जिले में वार्षिक ऋण योजना के अंतर्गत क्षेत्रवार कार्य निष्पादन
|
सामान्य क्षेत्र |
वर्ष 2006-07 |
वर्ष 2007-08 |
वर्ष 2008-09 |
पिछले तीन वर्षो में औसत उपलब्धि |
||||||
|
लक्ष्य (रू. 000) |
उपलब्धि (रू. 000) |
उपलब्धि (%) |
लक्ष्य (रू. 0.00) |
उपलब्धि (रू. 000) |
उपलब्धि (%) |
लक्ष्य (रू. 000) |
उपलब्धि (रू. 0.00) |
उपलब्धि (%) |
||
|
फसल ऋण |
612000 |
53964 |
88.18 |
660960 |
508224 |
76.89 |
88731 |
389872 |
43.94 |
69.67 |
|
मीयादी ऋण (कृषि) |
606074 |
427570 |
70.54 |
678815 |
421780 |
62.13 |
665596 |
523043 |
78.56 |
70.42 |
|
कुल कृषि ऋण |
1218074 |
967254 |
79.41 |
1339775 |
930004 |
69.41 |
1552906 |
912915 |
59.79 |
69.20 |
|
गैर कृषि क्षेत्र |
97202 |
58672 |
60.36 |
116205 |
56031 |
48.21 |
128775 |
54089 |
42.00 |
50.19 |
|
अन्य प्राथमिकता क्षेत्र |
496630 |
371792 |
74.86 |
59600 |
394332 |
66.16 |
677999 |
509899 |
75.21 |
72.08 |
|
कुल प्राथमिक क्षेत्र |
1811906 |
1397718 |
77.14 |
2051980 |
1380367 |
67.27 |
2359680 |
1644243 |
69.65 |
71.36 |
यदि देखा जाय तो ग्रामीण विकास में गैर कृषि क्षेत्र का योगदान कम नहीं होता 2006-07 में 60.34 प्रतिशत ऋण गैर कृषि क्षेत्र में प्रदान किये गये। हालांकि अगले वर्ष 48.21 प्रतिशत लक्ष्य को ही प्राप्त कर पाया कि अपने लक्ष्य का 50 प्रतिशत भी प्राप्त कर पाया। कृषि विकास के लिए गैर कृषि ऋण का बढना नितान्त आवश्यक है अन्य प्राथमिक क्षेत्र जो कृषि विकास में सहायक है उनमें ऋण का योगदान संभावनात्मक युक्त चाहिए। कुल प्राथमिक ऋण को देखा जाय तो 71.36 प्रतिशत का लक्ष्य बैंकों ने प्राप्त किया है। इसका स्पष्टीकरण दण्ड आरेख के माध्यम से तीन वर्षो में ऋण का औसत उपलब्ध व्यक्त किया गया है। ग्राफ में कृषि मियादी ऋण का अनुपात सर्वाधिक रहा है, इसके उपरांत फसल ऋण का अनुपात 69.79 स्पष्ट हो पाया है इसके साथ ही अन्य प्राथमिक क्षेत्रों में 72.8 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गयी है। हालांकि यह सीधे कृषि ऋण को प्रभावित नहीं करती पर ग्रामीण विकास में इसका एक महत्वपूर्ण योगदान है।6
नावार्ड ने जिले के फसल ऋण पर अहम भूमिका अदा की है। जिसके माध्यम से फसल उत्पादन में काफी मात्रा में वृद्धि हो पायी है। जिले में विकासखण्ड वार ऋण नावार्ड ने उपलब्ध कराया है। जिसमें त्योंथर के लिए धान की खेती के लिए 396 लाख रूपये का ऋण उपलब्ध कराया है। इसके बाद सर्वाधिक ऋण सिरमौर क्षेत्र को 420 लाख रूपये उपलब्ध कराया है। क्रमशः धान की उपज के लिए मैहर अमरपाटन, मउगंज नईगढ़ी मझिगवां रीवा सिरमौर में क्रमशः 258, 330, 120, 156, 264, 420, 396 ऋण राशि उपलब्ध कराया है जिसका कुल योग 2868 लाख का है। यह ऋण की मात्रा 120 इकाई लागत के रूप में भी गयी है सोयाबीन के उत्पादन के लिए नावार्ड ने रीवा संभाग के लिए सर्वाधिक ऋण 230.4 लाख का ऋण उपलब्ध कराया है इसके साथ ही क्रमशः ऋण का अनुदान रघुराजनगर, मैहर, रामनगर, नईगढ़ी, मझिगवां, सिरमौर, त्योंथर में क्रमागत रूप से 79.20, 28.80, 43.30, 36.00, 43.30, 155.2, 144, 115.2 ऋण उपलब्ध कराया है।9
रघुराजनगर में 550 हेक्टेयर के लिए ऋण अनुदान 63.53 लाख रहा है तथा मैहर में यह 46.20 लाख का तथा अमरपाटन में 700 लाख का रहा है। मऊगंज के लिए 250 हेक्टेयर के लिए 28.80 लाख का ऋण नावार्ड ने उपलब्ध कराया तथा नईगढ़ी में 34.65 लाख मझिगवां में 69.30 एवं रीवा में 173.25 लाख का कृषि का विकास उसके आधारभूत संसाधनों के विकास पर निर्भर करता है जब तक कृषि क्षेत्र का संसाधात्मक विकास नहीं होता तो कृषि विकास या उत्पादन विकास होना संभवन नहीं है अतः उसके उद्देश्य निम्न संसाधन ऋण उपलब्ध कराये है।
निष्कर्ष:
प्रस्तुत शोध अध्ययन रीवा जिले के कृषि विकास में सहकारी संस्थाओं को योगदान में जिले में संचालित विभिन्न वित्तीय संस्थाओं के द्वारा कृषि क्षेत्र में दी जाने वाला ऋण और अन्य सहायता के चलते कृषि क्षेत्र में होने वाले विकास का अध्ययन किया गया है। कृषि विकास के लिए देश में सामुदायिक विकास कार्यक्रम, सघन उत्पादन एवं उनका उपयोग कृषि की उन्नत विधियों का अविष्कार व कीटनाशी दवाइयों का अधिक उत्पादन एवं उनका उपयोग कृषि की उन्नत विधियों का अविष्कार लघु एवं सीमान्त कृषक विकास योजनाएं कृषि क्षेत्र में आवश्यकता ऋण की उपलब्धि हेतु बैंकों का राष्ट्रीयकरण, कृषि बीमा आदि कार्यक्रम शुरू किये गये। कृषि विकास के इन कार्यक्रमों के फलस्वरूप देश में खाघान्न उत्पादन में वृद्धि हुई लेकिन देश अनेक कृषि उत्पादों के उत्पादन में आत्म-निर्भर नहीं हो सका भारत कृषि प्रधान देश होते हुए भी कृषि क्षेत्र में अन्य विकसित देशों के समान प्रगति नहीं कर सका इसका प्रमुख कारण भारतीय कृषि की अपनी ही कुछ विशेषताएं थी।
संदर्भ ग्रंथ सूची :-
1. रमेश शर्मा चन्द्र - कृषि अर्थशास्त्र 1991-92 राजीव प्रकाशन लालकुर्ती मेरठ कैन्ट।
2. भारत 2001 - प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार नई दिल्ली 2002
3. बसंत देसाई - रूरल डेवलपमेन्ट वाल्यूम 1 से 6 हिमालया पब्लिशिंग हाउस दिल्ली जनवरी 1988
4. एम.पी. गुप्ता - स्टैटिस्टील मैथड्ल सुल्तान चन्द एण्ड सन्स दिल्ली 1975
5. बी.पी. धोष - प्राब्लम्स ऑफ एग्रीकल्चर क्रेडिट्स 1974
6. राष्ट्रीय बैंक नावार्ड ग्रामीण ऋण के क्षेत्र में राष्ट्रीय बैंक की भूमिका राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण बैंक 1992
7. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, स्टार समाचार, पत्रिका, नवभारत
8. योजना (वस्तु सेवा कर अगस्त 2017)
a. इण्डिया टूडे (नवम्बर 2017)
b. आउटलुक (30 अक्टूबर 2017
9. इन्टरनेट वेवसाइट:-
10. www.google.com
11. http://www.bbc.com/hindi/india- 39971584
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Received on 01.07.2025 Revised on 29.12.2025 Accepted on 30.03.2026 Published on 06.06.2026 Available online from June 10, 2026 Int. J. Ad. Social Sciences. 2026; 14(2):97-101. DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00021 ©A and V Publications All right reserved
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